मिथिलाक भूमि पुरातन कालहिं सऽ भारतीय संस्कृतिक' आकर्षण केन्द्र रहल अछि । कर्म आ धर्मक विविध क्षेत्र केर भारतीय वाङमय मे मिथिला क योगदान अविस्मरणनीय ! नृप विदेह,
याज्ञवल्यक कपिल, कणाद, उदयन, कवि कोकिल विद्यापति सॅ अधतन काल धरि प्रतिभाक भरमारि लागल
ई मिथिला अपन वणिता (मैथिली) क अस्तित्वक लेल संघर्षरत अछि ।
मॉ मैथिलीक अनुग्रह आ' अपना लोकनिक विशेष प्रयास सॅ मैथिली संविधानक अष्टम् अनुसूची
मे सम्मिलित तऽ भऽ गेल मुदा देसिल बयनाक विकास क लेल कोनो ठोस योजना नहि बनि सकल ।
हऽम मैथिल अपनहिं मध्य क्षेत्र, धर्म आ जाति क रुपे विभक्त छी । हम अपन मातृभाषा आ
मैथिल संस्कृति सॅ दूर जा रहल छी । अपन नेना सॅ मैथिलीमे गप्प कयला पर हमरा सभ केँ
लाजक अनुभव होइत अछि । हमर कहवाक ई उद्देश्य नहि जे अंग्रेजी नहि पढ़ू वा
राष्ट्रभाषा हिन्दीक प्रति समर्पित नहि होऊ । हमर विचार जे संगहि मातृभाषा क प्रति
कृतज्ञ रहू । हऽम बंगाली, गुजराती, मराठी, पंजाबी सॅ पैध पाश्चात्य भाषा
सम्पोषक नहि छी अपितु ओ तऽ अपन मातृभाषा नहि छोड़लनि ? जनगणना मे मातृभाषा के आगॉ
मैथिल हिन्दी लिखा दैत छथि । हिन्दी हमर मातृभाषा नहि भऽ सकैत अछि । हिन्दी
राष्ट्रभाषा क रुप मे सम्मानित छथि । सन् २००१ क जनगणना मे "मातृभाषा मैथिली लिखाऊ" एहि लेल चेतना जगाओल गेल । ई मर्मक गप्प । हमरा सभ केँ ई प्रचार करऽ पड़ैत अछि जे
हमर मातृभाषा
मैथिली थिक । वास्तविक रुपेँ हम तीन करोड़ सऽ वेसी छी । मुदा जनगणनाक रिपोर्ट देखू, सत्य बूझि जायब । एहि दशा क लेल हम सभ उतरदायी छी ।
हमर पिता स्व० काली कान्त झा "बूच" जे मैथिली मे लिखैत तऽ छलाह परंच विविध कारणवश अपन कविता केँ संकलित
नहि कऽ सकलाह । जा धरि मिथिला मिहिर आ माटि पानि सन पत्रिका छपैत छल, हिनक रचना प्रकाशित होइत
छलन्हि । एहि पत्रिकाक प्रकाशन बंद भेला पर हिनक रचना अपन गामक किछु लोकल मध्य मनोरंजन मात्रक साधन रहि गेल । पांडुलिपिक कागत फाटल आ स्व०कविक रचना लुप्त ?
हमरा सॅ जतेक उपलब्ध भऽ सकल ओकरा संकलित करवाक प्रयास कऽ रहल छी । एहि हेतु एकटा भोजपुरी मित्र रविरंजन जी सॅ विशेष सहयोग भेटल ।
आशाक संग-संग विश्वास अछि जे अपना सभ केँ ई संग्रह नीक लागत ।